मायाजाल

मायाजाल न तोड़ा जाये
लोभी मन मुझको तरसाये
मिल जाये तो रोग है दुनिया
मिल न सके तो मन ललचाये
मेरे अाँसू उनका दामन
रेत पे झरना सूखा जाये
शीशे के महलों में हरदम
काँच की चूड़ी खनकी जाये
प्यार मुहब्बत रिश्ते नाते
‘सानी’ कोई काम न अाये

Dr. Zarina Sani wrote this when her 10 year old son* once told her that she wrote very tough Urdu and he could not understand it and that she should perhaps write for the common man.

*http://tariquesani.net/blog/2002/08/05/112/

This free verse was published in “Sau Baras” in August 1976

शबोरोज़ वो ज़रुर रहे

हमारे साथ शबोरोज़ वो ज़रुर रहे
हमारे ज़ेहन की पिन्हाँईयों से दूर रहे

बहार आई थी, खौफे िखज़ाँ से लरज़ाँ थे
खिज़ा के दौर से गुज़रे तो बाशऊर रहे

हमारी तिश्नालबी राज़ बनके राज़ रही
जो कम सवाद थे आमाद ए ज़हूर रहे

हमें भी नाज़ था ज़ब्ते जुनून पर लेकिन
तुम्हारे शहर से गुज़रे तो नामबूर रहे

नयी गज़ल में मुनासिब नही है ए “सानी”
वही उसूल वही गुफ्तगू-वे-तूर रहे

 

शबोरोज़ – day and night
पिन्हाँ – secrets
खौफे िखज़ाँ – fear of autumn
लरज़ां – trembling
तिश्नालबी – प्यासे होंठ
आमाद ए ज़हूर – became visible (Zahoor is manifestation)
गुफ्तगू-वे-तूर – meaningful conversation.

 

This ghazal was published in “Naya Daur” in March 1979

अंदेशा

दौरे माज़ी की सुनहरी दुनिया
जिसमें हक और सदाक़त की हिफाज़त के लिये
कभी मसलूब हुये,
तख्त ए दार कभी
ज़हर का जाम कभी
कभी कोड़ों की सज़ा पायी है
तने नाज़ुक कभी संगसार हुआ
कभी काटों पे धसीटा हमको
आबे शमशीर से भी प्यास बुझाई हमने
आज माज़ी का तसलसुल टूटा
आज है ज़ौके शहादत की कमी,
बल्के िफक़दान कहो
आज इक्तेदार की खातिर हमने
अपना मस्लक भी बदल ड़ाला है
रूहे इन्सां को कुचल ड़ाला है
कोई बतलाये हमें
इसकी सज़ा क्या होगी

 

माज़ी – past
सदाक़त – truthfulness
मसलूब – crucified
तख्त ए दार – फांसी चढ़े (were hanged)
संगसार – throwing a stone
आबे शमशीर – Blood (aab is water, and shamsheer is sword)
तसलसुल -continuation
ज़ौके शहादत -temperament of martyrdom
िफकदान – scarcity /shortage
इक्तेदार – अधिकार /Authority
मस्लक-sect or caste

 

This free verse was published in a Delhi Magzine, Tehrir in October 1979

फिर चाक़ गिरेबाँ होने लगा

फिर चाक़ गिरेबाँ होने लगा
और मौत का सामाँ होने लगा

कुछ अश्क थमे थे ए हमदम
फिर दीदा-ए-गिरियाँ होने लगा

फिर साज़े आहे शबीना पर
हाथ अपना रक्साँ होने लगा

गुलज़ारे लाला-ए-दिल पर अब
लये दर्द-ए-बहाराँ होने लगा

अब लज़्जते ग़म पर ए ‘ज़ारी’
दिल अपना नाज़ाँ होने लगा

 

चाख गिरेबाँ – खुला हुआ सीना
दीदा-ए-गिरियाँ – आँखों से टपकते आँसूं
शबीना- अंधकार
रक्स-नाच
लाला-ए-दिल – दिल की लाली
नाज़ाँ – अभिमान युक्त

Dr. Zarina Sani wrote this Ghazal on 13th June 1963.

अंदाज़ देखो

निज़ामे मैकदा बिगड़ा हुअा है
निज़ामे खानकाह इससे भी बदतर
अज़ाँ बेसोज़, सजदे गैर मुखलिस
सदा नाकूस की बेकैफ़ सी है
इबादत में हुज़ूरी है, न लज़्जत
निजाते दीदा व दिल बे-यकीन हैं
तअय्युन गाम वो मंज़िल क्या करें हम
शुबह है, शक है, ला-दीनी भरी हुयी है
महोब्बत, अादमीयत
मसावात व हुज़ूरी
बुताने रंगो-बू के काफिले हैं
फरेबे दहर के ये सिलसिले हैं
खुलूसे दिल की नायाबी यहाँ है
खुद अपनी ज़ात से बेगानगी है
न शाने दिल रुबाई है
न अाशिक की अदा बाक़ी
तशद्दुद की हिमायत हर तरफ है
अकूवत का जनाज़ा पीटते हैं
सगीराने हरम हूँ या नक़ीबाने अजम हूँ
वही बाज़ीगरी है सामरी सी
वही अफसाना-ए-जादू सराई
मगर इसपर भी ये अंदाज़ देखो
तरक्कीयाफ्ता कहला रहे हैं

निज़ामे मैकदा – governance of tavern
निज़ामे खानका – governance  of home
बदतर – worst
अज़ाँ बेसोज़ – the call for prayer (is) without passion
गैर मुखलिस – lacking sincerity
सदा नाकूस – the call of conch (call for prayer)
बेखौफ – without any fear (of God)
शुबह है, शक है -doubts
ला-दीनी भरी हुयी है – there is no faith in religion
मसावत – equality
हुज़ूरी – presence
फरेब – deceit
दहर –  era
ज़ात – personality (of self)
तशद्दुद- violence
हिमायत- favor (here it means leaning towards violence)
अकूवत – faith
सगीराने हरम -visitors of house of God
नक़ीबाने अजम – dumb people who pray (without understanding)**
सामरी – illusion (of magic)
तरक्कीयाफ्ता – progressive

**Ajam is a somewhat derogatory word used for all non-Arabic people historically by the Arabs.

This nazm was published in the magazine “Tahreek, New Delhi” in January 1980