अंदेशा

दौरे माज़ी की सुनहरी दुनिया
जिसमें हक और सदाक़त की हिफाज़त के लिये
कभी मसलूब हुये,
तख्त ए दार कभी
ज़हर का जाम कभी
कभी कोड़ों की सज़ा पायी है
तने नाज़ुक कभी संगसार हुआ
कभी काटों पे धसीटा हमको
आबे शमशीर से भी प्यास बुझाई हमने
आज माज़ी का तसलसुल टूटा
आज है ज़ौके शहादत की कमी,
बल्के िफक़दान कहो
आज इक्तेदार की खातिर हमने
अपना मस्लक भी बदल ड़ाला है
रूहे इन्सां को कुचल ड़ाला है
कोई बतलाये हमें
इसकी सज़ा क्या होगी

 

माज़ी – past
सदाक़त – truthfulness
मसलूब – crucified
तख्त ए दार – फांसी चढ़े (were hanged)
संगसार – throwing a stone
आबे शमशीर – Blood (aab is water, and shamsheer is sword)
तसलसुल -continuation
ज़ौके शहादत -temperament of martyrdom
िफकदान – scarcity /shortage
इक्तेदार – अधिकार /Authority
मस्लक-sect or caste

 

This free verse was published in a Delhi Magzine, Tehrir in October 1979

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