अंदाज़ देखो

निज़ामे मैकदा बिगड़ा हुअा है
निज़ामे खानकाह इससे भी बदतर
अज़ाँ बेसोज़, सजदे गैर मुखलिस
सदा नाकूस की बेकैफ़ सी है
इबादत में हुज़ूरी है, न लज़्जत
निजाते दीदा व दिल बे-यकीन हैं
तअय्युन गाम वो मंज़िल क्या करें हम
शुबह है, शक है, ला-दीनी भरी हुयी है
महोब्बत, अादमीयत
मसावात व हुज़ूरी
बुताने रंगो-बू के काफिले हैं
फरेबे दहर के ये सिलसिले हैं
खुलूसे दिल की नायाबी यहाँ है
खुद अपनी ज़ात से बेगानगी है
न शाने दिल रुबाई है
न अाशिक की अदा बाक़ी
तशद्दुद की हिमायत हर तरफ है
अकूवत का जनाज़ा पीटते हैं
सगीराने हरम हूँ या नक़ीबाने अजम हूँ
वही बाज़ीगरी है सामरी सी
वही अफसाना-ए-जादू सराई
मगर इसपर भी ये अंदाज़ देखो
तरक्कीयाफ्ता कहला रहे हैं

निज़ामे मैकदा – governance of tavern
निज़ामे खानका – governance  of home
बदतर – worst
अज़ाँ बेसोज़ – the call for prayer (is) without passion
गैर मुखलिस – lacking sincerity
सदा नाकूस – the call of conch (call for prayer)
बेखौफ – without any fear (of God)
शुबह है, शक है -doubts
ला-दीनी भरी हुयी है – there is no faith in religion
मसावत – equality
हुज़ूरी – presence
फरेब – deceit
दहर –  era
ज़ात – personality (of self)
तशद्दुद- violence
हिमायत- favor (here it means leaning towards violence)
अकूवत – faith
सगीराने हरम -visitors of house of God
नक़ीबाने अजम – dumb people who pray (without understanding)**
सामरी – illusion (of magic)
तरक्कीयाफ्ता – progressive

**Ajam is a somewhat derogatory word used for all non-Arabic people historically by the Arabs.

This nazm was published in the magazine “Tahreek, New Delhi” in January 1980

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