अपनी तन्हाई से जब घबरा गये

अपनी तन्हाई से जब घबरा गये
तेरी अज़मत का सहीफा खोल कर देखा किये
मेरे दिल पर तेज़ नज़रों का असर
अब्र के कतरे जैसे मुज़तरिब पत्ते हुये
ग़ुल्सितां के वास्ते बेकार है अपना लहू
तिश्नगी खारे मग़ीलाँ की बुझे
मंज़िलों तक न रसाई का हमें शिकवा नहीं
राहबर के रूप में हासिद मिले
अहले मंसब, अहले ज़र अपने नहीं, दामन तही
बात ज़ाती खूबियों से क्या बने !
ज़ात का अहसास वाबिस्ता है “सानी” जिस्मों जाँ के तार से
बाद इसके मातमे अहबाब हो, या कब्र पर कतबा लगे

Publication date and magazine of this aazad nazm is not known

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