कश्मकश

फिर किसी मोड़ से संगीत की लय आती है
रक्स करते हैं कहीं सागरो मीना जैसे !
निखत ए ग़ुल है कहीं
मस्त गुलशन है कहीं
महकी महकी है हवा
भीनी भीनी सी फिज़ाओं में है खुशबू शामिल –
इक मुकद्दस तनवीर,
इक लताफत हरसू,
मुझको लगता है यही
चश्मे रोशन मेरी हस्ती को है यूँ घेरे हुये
जैसे माँ बच्चे को बाहों में जकड लेती है
और मैं सोच रहीं हूँ तन्हा
ज़ेहन के बंद दरीचों को न खुलने दूँगी
और नकीबाने मोहब्बत को न लकबैक कहूँगी
कब तक?
कब तक?

This nazm was published in “Alfaz” in September 1978

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