नित नयी ज़िन्दगी के तकाज़े

नित नयी ज़िन्दगी के तकाज़े हमें भी तो मंज़ूर है, आपको भी मग़र सोचना चाहिये
जज़्बा ए दिल से इन्कार मुमकिन नहीं, बंदगी के लिये नक्शे पा चाहिये

हुस्ने बालीदगी जिनके इकदार में, नक्शे आलम पे वो सिब्त होते हुये दायमी बन गये
लग़ज़िशे पा से घबराइये न ज़रा, तजुर्बों के लिये हौसला चाहिये

दिल के ज़ख्मों का अंदाज़ा कैसे करें अपने ही खोल में बंद रहतें हैं वो
चारासाज़ी व बखियाग़िरी के लिये ज़िन्दगी का वसी तजुर्बा चाहिये

आपकी बात ज़ूलिदा, मफून पेचीदा, तर्ज़े तखातिब मुनासिब नहीं
देखिये ! आपको आईना चाहिये

मुनजमिद बर्फ की सील है इसको पिघलाईये ताकि तखलीक हो एक तूफान की
रहनुमा न सही ! तेज़ रफ्तार हूँ, बर्क पा चाहिये

रंग है,  नूर है, हुस्न है, कैफ है, रौनके अंजुम से गरेज़ा हो क्यूँ
तुम परेशां हो “सानी” बताओ  तुम्हें और क्या चाहिये

This aazad ghazal was published in “Memark” in April 1973.

 

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