ज़िन्दगी का शबिस्तां मुनव्वर हुआ

ज़िन्दगी का शबिस्तां मुनव्वर हुआ, आपकी चश्मो  अब्रू के बल ही गये
बुझ रहे थे दिये आज जल ही गये
शुक्रिया आपका, ज़िन्दगी ग़म में भी मुस्कुराने लगी
हम बहलते बहलते बहल ही गये
खौफ खाते थे हम पहले हर हर कदम, लग़ज़िशें साथ थीं
राह के पेचो खम से ग़ुज़रते गुज़रते संभल ही गये
तेरे रिन्दे बिलानौश की खैर हो
ज़ुल्फ लहराई है, चाँदनी छाई है, सागरे चश्म महफिल में चल ही गये
ज़ुल्मते शाम-ए-ग़म की सिमटने लगीं ज़िन्दगी का नसीबा चमक जायेगा
“सानी” ज़ुल्फें परेशां के बल ही गये

This aazad ghazal was published in “Shakshar” in January 1973

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