मेरा ज़ौक-ओ-शौक हयात है

मेरा ज़ौक-ओ-शौक हयात है उसे खाक में न मिलाइये
मेरी रूह का ये सुकून है न मिटाइये

गुलो लाला का है नक़ाब क्यूँ मेरे और आपके दरमियाँ?
मुझे नाज़ ज़ौके निगाह पर चले आईये

अपना भी तो वजूद है उसे मान लें
फकत अपनी ज़ात के वास्ते मुझे मुस्तकिल न रुलाइये !

है जहां की सारी मसर्रतें मेरा दिल है फिर भी बुझा हुआ
मेरी रूह कैदे अलम में है उसे पहले आप छुड़ाईये

This aazad ghazal was published in “Roshni” Meeruth in February 1976

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