दिलनवाज़ी का वादा

दिलनवाज़ी का वादा वो करते रहे
शाख से टूट कर हम बिखरते रहे

नौ-ब-नौ राह पर ग़ाम ज़न जब भी कोई हुअा
तंज़ के तीरो-नश्तर रग़ों में उतरते रहे

सिलसिला खैरो-शर का अज़ल से अबद तक है फैला हुआ
इस तसादुम से जौहर निखरते रहेंगे, निखरते रहे

राह के पेचो ख़म में, बुलंदी व पस्ती में इक क़ैफ है
बेसबब हम तो डरते रहे

संगे खारा ही लाये तो कुछ ग़म नहीं काबिले फक्र अादम की तसखीर है
इसलिये मुद्दतों चाँद की सरज़मीं के लिये “सानी” मरते रहे

नौ-ब-नौ- quiet new
ग़ाम – चढ़ना
तंज़ – taunt, ताने
तीरो-नश्तर – arrows and thorns
खैरो-शर – अच्छा-बुरा
अज़ल से अबद तक – from time immemorial to eternity
तसादुम -collision
जौहर – skills (that shine like gems)
पेचो ख़म -complex and twisted
बुलंदी व पस्ती – उपर – नीचे
क़ैफ – exhilaration, सुरूर
संगे खारा – hard and rough stone
तसखीर – जीतना / to overpower

 

This aazad ghazal was published in the magazine “Kohasar” in August 1979

 

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