शीरीं नग्मा

रूह कुचली थी मेरी ग़म की गिराँबारी से
अशक आखों में छलकते हुये पैमाने से
कर्ब का ज़हर रगो-पै में बसा जाता था
वहम के नाग सरापा को डसे जाते थे
बिस्तरे नर्म पे भी नींद नहीं आती थी
दर्द-अँग़ेज़ थे लम्हे लेकिन
मेरे तखय्युल के तारों को किसी ने छेड़ा
एक शीरीं सी सदा
मुझको मसहूर किये जाती थी

“लौ लगा ले हमसे
अपनी दुनिया-ए-तसव्वुर में बसा ले हमको
ताकि दिल पर जो सनम तूने तराशे
फानी!
ये तुझे सोज़िशे पिन्हाँ के सिवा क्या देंगे
तेरे एवाने मोहब्बत को जिला क्या देंगे?”

ख्वाब से चौंक पड़ी
और ये अहसास हुआ
ये ख़लाई ये फिज़ाई उल्फत
किस तरह जान को तस्कीं होगी
मैं तो नज़्ज़ारों की आदी
मुझे कुर्बत की ज़रूरत होगी
वही नग्मा, वही शीरीं नग्मा
इक साहिर की तरह बनके मुजस्सिम उभरा

“हम तो हर वक्त तेरे पास रहा करते हैं
तेरी शहरग़ से करीं
चशमे बीना की ज़रूरत होगी”

था अजब नूर का आलम, रंगे तक़दीस लिये
इत्र बेज़ी थी फिज़ाओं मे बसे
कैफ-अँगेज़ हवाऐं
रगो-रेशे में उतर जाने को
जैसे बेताब हुयी जाती थीं
अब भी याद है मुझे
वही नग्मा वही शीरीं नग्मा

 

This nazm was published in “Mahanama” Lahore in January 1976.

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