मेरा फनकार

बुर्ज थामे हुये इज़ल पे झुका जाता है
ज़ुल्फ बिखरी हुयी पेशानी पर
शौके बे पाया झलकता हुआ रुखसारों से
फिक्र की चंद लकीरें उभरीं
अश पैमां है तखय्युल उसका
कोई शाहकार बनायेगा ये !
मेरा बच्चा, मेरी उम्मीदों का मरकस
मेरा फनकार है ये
मेरी नाकाम तमन्नाओं की तकमील करे
मेरी नाग़ुफ्ता हिकायत
मेरे इफ्तार की अज़्मत ले कर
मेरे इमां की हरारत ले कर
मेरा पैग़ामे मोहब्बत ले कर
अपना शाहकार मुज़य्यन कर ले !!

This poem was written by Zarina Sani for her 8 year old, who oblivious of his surroundings, was busy drawing.  She clicked his picture, and wrote this poem. It  was published in April 1974 in “Zewar”

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