शक

रूह आवारा फिरती रही चारसू
प्यार के वास्ते
रक्स करते हुये खनखनाते हुये खड़खड़ाते हुये
नोट और मालो-ज़र की ज़रूरत पड़ी
अपने दामन में थे कुछ उन्हें दे दिये
लेने वाले मोहब्बत से तकने लगे
रूह अहसास शबनम से मसरूरो शादां हुयी
वक्त जब टल गया –
सर्द मोहरी वही बेवफाई वही –
कज अदाई वही –
जिससे जलती रही –
कर्ब का ज़हर दिल में समोये हुये –
और आगे बढ़ी
मैंने जाना खुलूसो मोहब्बत मताऐ गिरां हैं –
अक़ीदत ग़िरां कद्र है –
पेशकश हुस्न की बारगाह में हुयी
वो ये कहने लगे
ये रियाकार है, इक अदाकार है
सर अकीदत ने पीटा, मोहब्बत की आखों से आंसू बहे –
कर्बो अंदोह का ज़हर घुलता रहा
मैं तडपती रही, रूह मेरी सिसकती रही –
और आगे बढ़ी
मेरे बच्चे खड़े थे, महकती महकती मोहब्बत लिये
उनको बाहों में भरकर यही सोचती रह गयी
ये भी धोका न हों !
रेत का चमचमाता सा चश्मा न हों !
सोचिये
आज ममता भी मशफूक है
सोचिये ! सोचिये !!

This poem was published in “Shayar” Bombay in April 1973; it was written on 13th January 1973.

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