मेरे बच्चे

मेरे बच्चे मेरी राहों पे बिछाये आंखे
बैठे रहतें है कोई प्यार की मूरत जैसे
अपने महबूब की रह तकती हो
उसकी आंखों के दिये
कभी बुझते हैं,  सुलगते हैं कभी
कभी उम्मीद से गुलनार रुखे रोशन है
और कभी खौफ से
छाये जाती है ज़र्दी ए खिज़ाँ
फिर भी कंदीले मोहब्बत की ज़ियापाशी से
इक किरण चारों तरफ फूटती है
ये मेरे प्यार के मख्ज़न हैं, गुलिस्तां मेरे
ये मेरे प्यार की तकमील हैं, मंज़िल मेरी
बाअसे इज़्ज़ोशर्फ, ज़ीनते महफिल मेरी

This nazm was published in “Shayar”, Bombay in January 1968

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