तिश्ना तमन्ना

जब भी शो-केस में रंगीन खिलौना कोई
मुझको आता है नज़र
दिल मचल जाता है पाने के लिये
मुज़्तरिब एसे बढ़े जाती हूँ
कहरुबा तिनके को जैसे खींचे
(कोई मासूम तमन्ना रही तिश्ना शायद)
दश्ते पुरशौक में थामे हुये पैकेट उसका
एक अजबसर खुशी हो जाती है तारी दिल पर
जैसे मयखानाबदोश आये घटा
और मये-ताब
छलक जाये रगे मीना से
कतरा कतरा रग़ो-रेशे में उतरती जाये
इस तर्बखैज़ घड़ी में अक्सर
खोलना चाहती हूँ
ज़ेहन के बंद दरीचों को, मैं दस्तक दे कर
कौन सी तिश्ना तमन्ना है ?
नहीं याद आता
कुछ भी नहीं याद आता

This nazm was published in “Tehreek” in February 1974

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