रूह की सारी कसाफत घुल गयी

रूह की सारी कसाफत धुल गयी रौशन दरीचे खुल गये
पत्थरों में एसे नज्ज़ारे मिले

ज़िन्दगी की बर्क रफ्तारी से फुरसत है किसे ?
कौन अब उनसे कहे ये लनतरानी छोडिये

जिसका पानी जौहरी कूवत ने गंदा कर दिया
तिश्नगी ऐसे समंदर से मेरी क्यूंकर बुझे !

चेहरा ए मानूस से उभरेंगे कितने अजनबी चेहरे शउरे वक्त की अम्वाज में
अपनी तनहाई के दरिया में तू पत्थर फेंक दे

रफ्ता रफ्ता महफिले शेरो सुखन की रोशनी बढ़ती रही
खूने दिल जलता रहा फन के लिये

बेवफाई, कजअदाई हो मुबारक हम चले परवाह नही
गुफ्तगू के ज़हर में कुछ और तल्खी घोलिये !

ख्वाब सी धुंधली फिज़ा, माहौल अफसुर्दा, सुखन की साँस है उखडी हुयी
रंगे महफिल देख कर “सानी” कहे तो क्या कहे ?

This aazad ghazal was published in “Kitab”, Lucknow

ज़िन्दगी कर्ब है सोज़ है रक्स है साज़ है

जिन्दगी कर्ब है सोज़ है रक्स है साज़ है
आपकी चश्मे रौशन सा अंदाज़ है

मेरे अहसास छूने लगे हैं तसव्वुर के मिज़राब को आपके
क्यूं परेशान हैं? आपका राज़ भी तो मेरा राज़ है

जिसके फिक़दान का लोग मातम करें
आज भी मुझको इन्सानियत के इस प्यार पर नाज़ है

बेगानी के तारीक साये की लरज़िश नहीं चाहिये
नासाह! इन के लुत्फ व मोहब्बत का आग़ाज़ है

हम बुलायें सरे बज्म एसी रिवायत नहीं !
जी हमारी नहीं आप ही की ये आवाज़ है

ये जहाने फना क्यूं नज़र आ रहा दिलकश व दिलरूबा
“सानी” अब से सनम के तसव्वुर का एजाज़ है

This azad ghazal was published in “Adraak” in February 1975

रौशनी के वरक

लुटाये गये रौशनी के वरक चारसू
कभी निख़त की है नज़र, आ रहे तैरग़ी के वरक चारसू

आजकल ज़िन्दगी का उफक ज़र्द है
खिज़ाँ की हंसी के वरक चारसू

अजनबी रास्ते, अजनबी मंजिले राहबर का भरोसा नहीं
खो न जायें कहीं ज़िन्दगी के वरक चारसू

फर्द की ज़ात से मेहर इन्सानियत का चमकता रहा
बिखरते रहे इल्म की चाँदनी के वरक चारसू

इक जुनूं खेज़ जज़्बे की तशहीर थी
यूँ तो फैले रहें आगही के वरक चारसू

फलसफा ज़ात का और अना का न मखसूस कर “सानी” इस दौर से
मीरो ग़ालिब से लेकर यहाँ तक खुदी के वरक चारसू

This azad ghazal was published in the magazine “Shiraza”

 

ज़िन्दगी की हसीन और शादाब वादी

ज़िन्दगी की हसीन और शादाब वादी में रहकर भी जलती रही
एक लायनी तक़दीज़ के वास्ते खून अपनी तमन्ना का पीती रही

चांद का अक्स लहरों पर गिरकर बिखरता रहा
उनकी नज़रों के गहरे समंदर में, मेरी मोहब्बत यूं ही टूटती और बिखरती रही

सदक औ अखलास का कुछ पता ही न था, मुनकशिफ ये हुआ
सिर्फ झूठे वक़ार व नुमाइश की खातिर गुनाहों से बचती रही

हर तरफ रंगो-निखत का सैलाब था, दावते कैफ थी
ज़ात के खोल में बंद, मैं अपनी तन्हाइयों में सिसकती रही

“हर तरफ सब्ज़े रंगत का तूफान है क्यूं नुमाया तुम्ही ज़र्द रंगत में हो”
रूह को ताज़गी, जिन्दगी को खुशी अज़्मो हिम्म्त से मिलती रही

कौल और फेल का फर्क “सानी” ज़रा देखिये
इत्हादो मोहब्बत का नग़्मा लबों पर रहा, आग नफरत की दिल में दहकती रही

This aazad ghazal was published in “Memark”, in November 1973