रौशनी के वरक

लुटाये गये रौशनी के वरक चारसू
कभी निख़त की है नज़र, आ रहे तैरग़ी के वरक चारसू

आजकल ज़िन्दगी का उफक ज़र्द है
खिज़ाँ की हंसी के वरक चारसू

अजनबी रास्ते, अजनबी मंजिले राहबर का भरोसा नहीं
खो न जायें कहीं ज़िन्दगी के वरक चारसू

फर्द की ज़ात से मेहर इन्सानियत का चमकता रहा
बिखरते रहे इल्म की चाँदनी के वरक चारसू

इक जुनूं खेज़ जज़्बे की तशहीर थी
यूँ तो फैले रहें आगही के वरक चारसू

फलसफा ज़ात का और अना का न मखसूस कर “सानी” इस दौर से
मीरो ग़ालिब से लेकर यहाँ तक खुदी के वरक चारसू

This azad ghazal was published in the magazine “Shiraza”

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *