ज़िन्दगी की हसीन और शादाब वादी

ज़िन्दगी की हसीन और शादाब वादी में रहकर भी जलती रही
एक लायनी तक़दीज़ के वास्ते खून अपनी तमन्ना का पीती रही

चांद का अक्स लहरों पर गिरकर बिखरता रहा
उनकी नज़रों के गहरे समंदर में, मेरी मोहब्बत यूं ही टूटती और बिखरती रही

सदक औ अखलास का कुछ पता ही न था, मुनकशिफ ये हुआ
सिर्फ झूठे वक़ार व नुमाइश की खातिर गुनाहों से बचती रही

हर तरफ रंगो-निखत का सैलाब था, दावते कैफ थी
ज़ात के खोल में बंद, मैं अपनी तन्हाइयों में सिसकती रही

“हर तरफ सब्ज़े रंगत का तूफान है क्यूं नुमाया तुम्ही ज़र्द रंगत में हो”
रूह को ताज़गी, जिन्दगी को खुशी अज़्मो हिम्म्त से मिलती रही

कौल और फेल का फर्क “सानी” ज़रा देखिये
इत्हादो मोहब्बत का नग़्मा लबों पर रहा, आग नफरत की दिल में दहकती रही

This aazad ghazal was published in “Memark”, in November 1973