ड़ा. ज़रीना सानी की नागहानी मौत पर – ज़िया फतेहाबादी

While Dr. Zarina Sani worked on the biographical book on Zia Fatheabadi, they formed a close bond. On her untimely demise he expressed his grief with these heartbreaking words.

The Ghazal was published in his book “Naram Garam Hawain” in the 1987 edition (page 37) and has been included in “Meri Tasveer” 2011 edition (page 92)

पा शिकस्ता रबाब है ख़ामोश
पर्दा पर्दा हिजाब है ख़ामोश

ख़ुमकदे में सुकूत का आलम
खाना ए आफताब है ख़ामोश

थम गयी कायनात की गरदिश
शोरिश-ए-इन्क़लाब है ख़ामोश

हादसों की ये खुद पशेमानी
खलिश-ए-इज़तिराब है ख़ामोश

बेसवाली दलील-ए-नाफ़हमी
आईना-ए-लाजवाब है ख़ामोश

मँज़िल-ए-रेगज़ार ख़ाक बसर
तिशनगी-ए-शराब है ख़ामोश

ऐ ग़म-ए-दिल न शोर-ए-हश्र न उठा
ज़िन्दगी महव-ए-ख़्वाब है ख़ामोश

बेक़राँ दश्त-ए-बेकसी में “ज़िया”
दिल-ए-ख़ानाख़राब है ख़ामोश

— ज़िया फतेहाबादी

पा – पाँव/feet
शिकस्ता –  हारे हुये / broken
रबाब – वाद्य/ a stringed instrument
ख़ुमकदा – मदिरालय / wine bar
सुकूत – चुप्पी / silence
खाना-ए-आफताब – सूरज का घर  / Sun’s home
कायनात – संसार /world
गरदिश – दुर्भाग्य/ misfortune
शोरिश- दंगाफसाद / disturbances
खलिश -चुभन / pain
इज़तिराब-  बेचैनी / restlessness
दलील- argument
नाफ़हमी- मूर्खता
रेगज़ार- रेग़िस्तान / desert
तिशनगी- प्यास / thirst
हश्र- कोलाहल /lament
महव-ए-ख़्वाब- मिटा हुआ सपना /an erased dream
बेक़राँ – असीम /boundless
बेकसी- मजबूरी
ख़ानाखराब- अभागा /unfortunate

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *