मेरी सुबह हो के न हो मुझे है फिराक़ से वास्ता

मेरी सुबह हो के न हो मुझे है फिराक़ यार से वास्ता
शबे ग़म से मेरा मुकाबला दिले बेकरार से वास्ता

मेरी जिन्दगी न संवर सकी मेरे ख्वाब सारे बिखर गये
मैं खिजाँ रसीदा कली हूँ अब मुझे क्या बहार से वास्ता

जो था हाल ज़ार वो बिखर चुकी मगर अब खुशी है ये आपकी
कि जवाबे खत मुझे दें न दें, मुझे इंतिज़ार से वास्ता

मेरे इश्क में ये नहीं रवा कि खुलूस प्यार का लूँ सिला
कहूं क्यूँ मैं आपको बेवफा मुझे अपने प्यार से वास्ता

बड़ी बेखुदी में निकल पड़ी ए “ज़रीना” खैर हो राह की
जहां काफिले लुटे रोज़ो-शब उसी रहगुज़र से वास्ता

This ghazal was published in “Aasar”, Calcutta in February 1961

 

 

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