अखूवत का उजाला

िकस कदर जोश से इन्सां का खूँ करते हैं
जंग होती है तो इन्सान बदल जाते हैं
कितने इन्सान को तोपों से उड़ा देते हैं
मज़्हबो मुल्क के फरमान बदल जाते हैं

नौ-बहारें भी फिज़ाओं से बदल जाती हैं
कितनी नाकाम तमन्नायें सिसक उठती हैं
कितनी मांगों में भरी जाती है खूँ की सुरखी
अपने बच्चों के लिये मायेँ बिलख उठती हैं

ज़िंदा रहने के जो सामान अता करती हैं
उन ज़मीनों को भी बेकार बना देते हैं
बेमुहाबाना किसी शहर पे बमबारी से
कितने माज़ी के निशानात मिटा देते हैं

बाअसे नंग है इंसा के लिये जंग-जुइ
अम्नो-अमन का परचम तो उठा ले कोई
हम अखूवत व मोहब्बत का उजाला कर दें
इक ज़रा प्यार भरे दिल से सदा दे कोई

Publication date and magazine not known

 

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