यादें

एहदे माज़ी के झरोखों से चली आतीं हैं
मुस्कुराती हुयी यादें मेरी
गुनगुनाती हुई यादें मेरी
और महसूस ये होता है मुझे
जैसे बंजर सी ज़मीं
कतरा ए अब्र गुहारबार से शादाब बनी
जैसे सेहरा में भटकते हुये इक राही को
चश्मा ए आब मिला
जैसे पामाल तमन्नायें तुरशाह पा कर
फिर तरोताज़ा हुयीं
जैसे तरसीदा कली
मुस्कुराहट से दिलआवेज़ बने
एक लम्हे के लिये
सीना ए सूज़ाँ मेरा
शबनमी याद से मुस्काता है
एक लम्हे के लिये
कंपकंपाती हुयी सहमी हुयी हस्ती में
उन्ही यादों की हलावत में समा जाती है
यही यादें तो मेरी जीस्त का सरमाया हैं !
मुस्कुराती हुयी यादें मेरी
गुनगुनाती हुयी यादें मेरी

This nazm was published in “Naya Daur” in January 1971; was written on 9/4/1968