वादी ऐ होश में अंधेरा है

वादी ऐ होश में अंधेरा है
लौट जा दिल अभी सवेरा है

दिल के आंगन में कोई दीप जले
हर तरफ ज़ुल्मतों का डेरा है

है अदम से वजूद फिर से अदम
जिन्दगी का हसीन फेरा है

मेरी हर शय से आपको नफरत
आपका हर अजीज़ मेरा है

बीन बजती सुनाई देती है
बसे पर्दा कोई संपेरा है

याद गेसू ए यार में गुज़रे
वहशतों का घना अंधेरा है

कैसे खुद आगही मिले “सानी”
आरज़ुओं का सख्त घेरा है !

This ghazal was published in “Memark” in August 1970