कत्ल किया

जिस घनी छांव की आखों में तमन्ना लेकर
तुम को देखा था कभी
अब वो तमन्ना न रही
सर्दमोहरी ने उसे कत्ल किया
और फिर?
कितने तपते हुये सेहराओं से गुज़री हूँ मैं
मेरी आखों में बग़ूलों के कई मंज़र हैं
उम्र से हुस्न का रिश्ता क्या है?
हुस्न आखों की तमन्ना कहिये
कैफो रानाई से कुछ दूर सही
ज़िन्दगी यूँ ही गुज़र जायेगी
अब तो वीरानी भी वीरानी नहीं लगती
मुझको सन्नाटे से वहशत भी नहीं होती है
मैं नहीं चाहती अब
दो घड़ी दर्द की मेहमां होकर
मुन्कता रिश्ता ए जिस्मों जाँ हो
तुम हवा दोगे तो चिंगारी सुलग जायेगी
ये सितम अब न कर – दिलरुबा! जाने जहाँ!!

This poem was published in “Hamasr” in February 1977

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