जंगलों में कहीं

जंगलों में कहीं
इक ग़ज़ाले हंसी
दिलरुबा बन गयी
छा गयी दीदा-औ-दिल पे इक बेखुदी
उसके पीछे चली
मैं तो चलती गयी
रक्स करती हुयी

महवे हैरत हुयी
देख कर एक कस्र दिल आरा की रानाइयाँ
खुशनुमा पत्थरों के सुतूं रंगो निखत के तूफान के सामने ज़िन्दगी सरनगूँ
महज़बीनों का रक्से जुनूँ
मतरबे नग्मा ज़न
मौजे मय गुलफिशाँ
सारा माहौल कैफो सुरूर आश्ना
बर्क गिरफ्तार लम्हों को
चाहा जिरफ्तार कर लूं मगर
हाथ से वो फिसलते गये
इक ख़ला रह गया
खाली खाली निगाहों से
मैं देखती रह गयी !

This Nazm was published in “Tahreek” in May 1976 (was written on 7th January 1975)

 

 

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