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ऐ संगे-राह

May 30th, 2011 No comments

ऐ संगे-राह ! आबलापई न दे मुझे
एसा न हो कि कोई राह सुझाई न दे मुझे

सतहे शऊर पर है मेरे शोर इस कदर
अब नग्मा-ए-ज़मीर सुनाई न दे मुझे

इन्सानियत का जाम जहँा पाश पाश हो
अल्लाह मेरे एसी खुदाई न दे मुझे

रंगीनियाँ शबाब की इतनी हैं दिल फरेब
बालों पे आती धूप दिखाई न दे मुझे

तर्क-ए-तआलुक्कात पे इसरार था तुझे
अब तो मेरी वफा की दुहाई न दे मुझे

बे-बालों पर हूँ, रास न आयेगी ये फिज़ा
“सानी” कफस से अपनी रिहाई न दे मुझे

 

This ghazal was published in “Pasbaan”, Chandiarh on 26th February, 1979.