सारे जहां का दर्द

मैंने माना कि ये लम्हात हंसीं होते हैं
कीमती, बेशबहा
और तुम चाहते हो
एसे लम्हात में फिक्रों का कोई दखल न हो
मेरी रग रग से नशा सा फूटे
रुख पे हलकी सी हया की सुर्खी
रक्स करती हो मसर्रत की किरन आरिस पर
थरटराहट हो लबों पर जैसे
पंखडी फूल की शबनम की तरावश से हिले
खुदफरामोशी का आलम छाये
और मैं ?
साकितो-सामित
जैसे पत्थर हो कोई
मेरे हमदम ये तकाज़े हैं तुम्हारे फितरी
मैं भी मजबूर हूं सोचो तो सही
आपने आहसास के शीशे को तोडूं कैसे
जिसमें आते हैं नज़र अक्स कई !
मेरी माँ बेवा है
मग़्मूम रहा करती है
उसके आंसू की नमी
दिल की गहराईमें होती हुयी
रग रग में समां जाती है
एक सोज़िश सी बिखर जाती है जिस्मों जाँ में
और मैं माज़ी की शादाब फिज़ाओं में पनाह लेती हूँ
उसका हंसता हुआ चेहरा
रौनकें कितनी बहारों की फिदा थीं जिसपर
उसकी आखों में मोहब्बत के दिये जलते थे
उसकी आगोश में मेरी हस्ती खो जाती थी
और अचानक मुझे वालिद का खयाल आता है
मौत के साये तले
जिनके माथे को छुआ था मैने
अब भी उस लम्स की याद आती है
सर्द रौ मेरी रगो-पै में उतर जाती है
मेरी हस्ती मुझे बिखरी सी नज़र आती है
मेरे हमदम !
एक खातून है तनहा
जिसके चेहरे पे तबस्सुम की नकाब होती है
सोज़े दिल फिर भी अयाँ होता है
उसकी उल्फत पे ज़माने ने सितम ढाया है
उसको शिकवा है ज़माने से बहुत
उससे रिश्ता नहीं खूनी मेरा
फिर भी महबूब सी लगतीं है मुझे
उसका ग़म रूह को तड़पाता है
यही होती है तमन्ना मेरी
उसका ग़म घोल के पी लूं जैसे
शिवशंकर ने ज़हर मथ के समंदर का पिया
उसके चेहरे पर मसर्रत की ज़ियाबारी हो
जिससे हस्ती हो मुनव्वर मेरी
एसे ही कितने नज़र आतें हैं चेहरे मुझको
अपने एहसास के शीशे को मैं कैसे तोड़ूं ?
میں نے مانا کہ یہ لمحات حسیں ہوتے ہیں
قیمتی بیش بہا
اور تم چاہتے ہو
ایسے لمحات میں فکروں کا کوئی دخل نہ ہو
میری رگ رگ سے نشہ سا پھوٹے
رُخ پہ ہلکی سی حیا کی سرخی
رقص کرتی ہو مسرت کی کرن عارض پر
تھرتھراہٹ ہو لبوں پر ، جیسے
پنکھڑی پھول کی شبنم کی تراوش سے ہلے
خود فراموشی کا عالم چھائے
اور میں؟
ساکت و صامت
جیسے پتھر ہو کوئی
میرے ہمدم یہ تقاضے ہیں تمہارے فطری
میں تو مجبور ہوں سوچو تو سہی
اپنے احساس کے شیشے کو میں توڑوں کیسے؟
جس میں آتے ہیں نظر عکس کئی!
میری ماں بیوہ ہے
مغموم رہا کرتی ہے
اس کے آنسو کی نمی
دل کی گہرائی میں ہوتی ہوئی
رگ رگ میں سما جاتی ہے
ایک سوزش سی بکھر جاتی ہے جسم و جاں میں
اور میں ماضی کی شاداب فضاؤں میں پناہ لیتی ہوں
اس کا ہنستا ہوا چہرہ
رونقیں کتنی بہاروں کی فدا تھیں جس پر
اس کی آنکھوں میں محبت کے دئیے جلتے تھے
اس کی آغوش میں ہستی مری کھو جاتی تھی
اور اچانک مجھے والد کا خیال آتا ہے
موت کے سائے تلے
جن کے ماتھے کو چھوا تھا میں نے
اب بھی اس لمس کی یاد آتی ہے
سرد رَو میری رگ و پے میں اتر جاتی ہے
میری ہستی مجھے بکھری سی نظر آتی ہے
میرے ہمدم!
ایک خاتون ہے تنہا
جس کے چہرے پہ تبسم کی نقاب ہوتی ہے
سوزِ دل پھر بھی عیاں ہوتا ہے
اس کی الفت پہ زمانے نے ستم ڈھایا ہے
اس کو شکوہ ہے زمانے سے بہت
اس سے رشتہ نہیں خونی میرا
پھر بھی محبوب سی لگتی ہے مجھے
اس کا غم روح کو تڑپاتا ہے
یہی ہوتی ہے تمنا میری
اس کا غم گھول کے پی لوں جیسے
شیو شنکر نے زہر متھ کے سمندر کا پیا
اس کے چہرے پہ مسرت کی ضیا باری ہو
جس سے ہستی ہو منور میری
ایسے ہی کتنے نظر آتے ہیں چہرے مجھ کو
اپنے احساس کے شیشے کو میں کیسے توڑوں؟
This nazm was published in “Aajkal” in August 1975;  it was written on 4th January 1975.