नया मोड़ मिले

आपको देखके एहसास हुआ
जैसे मुद्दत से शनासाई हो
दिल के रिशते यूँ ही होते हैं मगर!
आपकी सिम्त बढ़ी
सेहर ज़दा सी होकर!
जैसे खीचें किसी तिनके को कोई काहरुबा
आपका नर्म चमकता चेहरा
जैसे कंदील मेरी राहों की
मेरे मुर्शत, मेरे मुशफ्फक!
मेरे ऐ काबा ऐ दीन!
मेरी राहों को उजाला बख्शें
ज़ंग आलूद है शीशा दिल का
चश्मे ताबाँ से मुज्जला कर दें …
ज़ज़्बा ए कार उभरता ही नहीं
अपनी उल्फत से हरारत बख्शें
अज़मते फन भी मेरी जूया हो मुझको
तर्ज़े नौ की हूँ
िजद्दते इत्कार मिले
मेरी तामीर को
आहंग नया
इक नया रूप नया रंग
नया मोड़ मिले
मेरे मुर्शद मेरे ऐ किब्ला-ए-दीन

This poem was published in Zewar in July 1974 (written in March 1972)