आबलापाई है महरूमी है रुसवाई है

आबलापाई है महरूमी है रुसवाई है
उस बुते नाज़ का दिल फिर भी तमन्नाई है

मेरी आखों से टपकते हैं लहू के आंसू
आज बेलौस मोहब्बत की भी रुसवाई है

लब पर फिर नाम वही, हुस्न वही आखों में
ए दिले ज़ार यही तेरी शकीबाई है

मज़्हका खैज़ है अंदाज़े तकल्लुम उनका
मये उल्फत मगर आखों में उतर आई है

“सानी” ए ज़ार तू अब और करेगी क्या क्या
आस्ताने पे मुसलसिल तो जबीं साई है

This Ghazal was published in “Pagdandi”, Amritsar in November 1965