नक्शे माज़ी

जब गुज़रते हो तुम इस राह से ऐ माहेजबीं
राहे पामाल की तकदीर चमक उठती है
रंग और नूर फिज़ाओं में बिखर जाते हैं
साज़े नग्मात बहिश्ती की झनक उठती है

नक्शे माज़ी के उभर आते हैं रफ्ता रफ्ता
प्यार में डूबी सदायें मुझे याद आती हैं
ज़िन्दगानी का शबिस्तां महक उठता है
कई कंदीलें मोहब्बत की चमक जातीं हैं

आपके हुस्न से फैली हुई निखत लेकर
अपने अहसासे मोहब्बत को जिला देतीं हूं
भूल जाती हूँ रियाकार कहा है मुझको
अपनी बेताब निगाहों को बिछा देती हूं

मेरी उल्फत में रियाकारी का अंसर भी नहीं
आपके हुस्ने मुकद्दस की कसम खाती हूं
किस तरह आपने तौहीने मोहब्बत की थी
याद आता है लरज़ती  हूं सहम जाती हूं

देखना है यूं खफा रहते हैं मुझसे कब तक
अपनी उल्फत की सदाकत पे यकीन रखती हूं
आपकी नज़रे करम आज नहीं है लेकिन
अहदे माज़ी की मोहब्बत पे यकीन रखती हूं

This ghazal was published in Sarita in September 1965